Wednesday, 8 June 2016


एक दौलतमंद इंसान ने अपने बेटे को वसीयत करते हुऐ कहा "बेटा मेरे मरने के बाद मेरे पैरों मे ये फटे हुऐ मोज़े (जुराबें) पहना देना, मेरी यह ख्वाहिश जरूर पूरी करना।
बाप के मरते ही नहलाने के बाद बेटे ने पंडितजी से बाप की ख़ाहिश बताई, पंडितजी ने कहा हमारे धर्म में कुछ भी पहनाने की इज़ाज़त नही है, पर बेटे की ज़िद थी कि बाप की आखरी ख़ाहिश पूरी हो, बहस इतनी बढ़ गई की शहर के पंडितो को जमा किया गया लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला,
इसी माहौल में एक शक़्स आया और आकर बेटे के हाथ मे बाप का लिखा हुवा खत दिया जिस मे बाप की नसीहत लिखी थी
"मेरे प्यारे बेटे"
देख रहे हो ? दौलत, बंगला ,गाड़ी और बड़ी बड़ी फैक्ट्री और फॉर्म हाउस के बाद भी मैं एक फटा हुवा मोजा तक नहीं ले जा सकता,
एक रोज़ तुम्हें भी मौत आएगी, आगाह हो जाओ तुम्हे भी एक कफ़न मे ही जाना पड़ेगा, लेहाज़ा कोशिश करना दौलत का सही इस्तेमाल करना,
नेक राह में ख़र्च करना, बेसहाराओं को सहारा बनना क्युकि अर्थी में सिर्फ तुम्हारे कर्म ही जाएंगे🙏

दिल छूने वाली कहानी....



दिल छूने वाली कहानी....

एक बार की बात है एक जंगल में सेब
का एक बड़ा पेड़ था। एक बच्चा रोज उस पेड़
पर खेलने आया करता था। वह कभी पेड़ की
डाली से लटकता कभी फल
तोड़ता कभी उछल कूद करता था, सेब
का पेड़ भी उस बच्चे से काफ़ी खुश रहता
था। कई साल इस तरह बीत गये। अचानक एक
दिन
बच्चा कहीं चला गया और फिर लौट के नहीं
आया, पेड़ ने उसका काफ़ी इंतज़ार किया पर
वह नहीं आया। अब तो पेड़ उदास हो गया ।
काफ़ी साल बाद वह बच्चा फिर से पेड़ के
पास आया पर वह अब कुछ बड़ा हो गया था।
पेड़
उसे देखकर काफ़ी खुश हुआ और उसे अपने साथ
खेलने के लिए कहा।
पर बच्चा उदास होते हुए
बोला कि अब वह बड़ा हो गया है अब वह उसके
साथ नहीं खेल सकता। बच्चा बोला की अब
मुझे खिलौने से खेलना अच्छा लगता है पर
मेरे पास खिलौने खरीदने के लिए पैसे नहीं
है। पेड़ बोला उदास ना हो तुम मेरे फल तोड़
लो और उन्हें बेच कर खिलौने खरीद लो।
बच्चा खुशी खुशी फल तोड़ के ले गया लेकिन
वह फिर बहुत दिनों तक वापस नहीं आया। पेड़
बहुत दुखी हुआ। अचानक बहुत दिनों बाद
बच्चा जो अब जवान हो गया था वापस
आया,
पेड़ बहुत खुश हुआ और उसे अपने साथ खेलने
के लिए कहा पर लड़के
ने कहा कि वह पेड़ के साथ नहीं खेल सकता
अब मुझे कुछ पैसे चाहिए क्यूंकी मुझे अपने
बच्चों के लिए घर बनाना है। पेड़ बोला मेरी
शाखाएँ बहुत मजबूत हैं
तुम इन्हें काट कर ले जाओ और अपना घर
बना लो। अब लड़के ने खुशी खुशी सारी
शाखाएँ काट डालीं और लेकर चला गया।
वह फिर कभी वापस नहीं आया।
बहुत दिनों बात जब वह वापस आया तो बूढ़ा
हो चुका था पेड़ बोला मेरे साथ खेलो पर वह
बोला की अब में बूढ़ा हो गया हूँ अब नहीं
खेल सकता।
पेड़ उदास होते हुए
बोला की अब मेरे पास ना फल हैं और
ना ही लकड़ी अब मै तुम्हारी मदद
भी नहीं कर सकता। बूढ़ा बोला की अब उसे
कोई सहायता नहीं चाहिए बस एक
जगह चाहिए जहाँ वह बाकी जिंदगी आराम
से
गुजार सके। पेड़ ने उसे अपने जड़ मे पनाह दी
और बूढ़ा हमेशा वहीं रहने लगा।
मित्रों इसी पेड़ की तरह हमारे माता पिता
भी होते हैं, जब हम छोटे होते हैं तो उनके
साथ खेलकर बड़े होते हैं और बड़े होकर
उन्हें छोड़ कर चले जाते हैं और तभी वापस
आते हैं ,जब हमें कोई ज़रूरत होती है।
धीरे धीरे ऐसे ही जीवन बीत जाता है। हमें
पेड रूपी माता पिता की सेवा करनी
चाहिए
ना कि सिर्फ़ उनसे
फ़ायदा लेना चाहिए।

Monday, 6 June 2016

माँ तो माँ है - I LOVE MOM

 


पत्नी बार बार मां पर इल्जाम लगाए जा
रही थी और पति बार बार उसको अपनी हद में
रहने की कह रहा था
लेकिन पत्नी चुप होने का नाम ही नही ले
रही थी व् जोर जोर से चीख चीखकर कह रही
थी कि
"उसने अंगूठी टेबल पर ही रखी थी और तुम्हारे
और मेरे अलावा इस कमरें मे कोई नही आया
अंगूठी हो ना हो मां जी ने ही उठाई है।।
बात जब पति की बर्दाश्त के बाहर हो गई तो
उसने पत्नी के गाल पर एक जोरदार तमाचा दे
मारा
अभी तीन महीने पहले ही तो शादी हुई थी ।
पत्नी से तमाचा सहन नही हुआ
वह घर छोड़कर जाने लगी और जाते जाते पति
से एक सवाल पूछा कि तुमको अपनी मां पर
इतना विश्वास क्यूं है..??
तब पति ने जो जवाब दिया उस जवाब को
सुनकर दरवाजे के पीछे खड़ी मां ने सुना तो
उसका मन भर आया पति ने पत्नी को बताया
कि
"जब वह छोटा था तब उसके पिताजी गुजर गए
मां मोहल्ले के घरों मे झाडू पोछा लगाकर जो
कमा पाती थी उससे एक वक्त का खाना
आता था
मां एक थाली में मुझे परोसा देती थी और
खाली डिब्बे को ढककर रख देती थी और
कहती थी मेरी रोटियां इस डिब्बे में है
बेटा तू खा ले
मैं भी हमेशा आधी रोटी खाकर कह देता था
कि मां मेरा पेट भर गया है मुझे और नही
खाना है
मां ने मुझे मेरी झूठी आधी रोटी खाकर मुझे
पाला पोसा और बड़ा किया है
आज मैं दो रोटी कमाने लायक हो गया हूं
लेकिन यह कैसे भूल सकता हूं कि मां ने उम्र के
उस पड़ाव पर अपनी इच्छाओं को मारा है,
वह मां आज उम्र के इस पड़ाव पर किसी अंगूठी
की भूखी होगी ....
यह मैं सोच भी नही सकता
तुम तो तीन महीने से मेरे साथ हो
मैंने तो मां की तपस्या को पिछले पच्चीस
वर्षों से देखा है...
यह सुनकर मां की आंखों से छलक उठे वह समझ
नही पा रही थी कि बेटा उसकी आधी
रोटी का कर्ज चुका रहा है या वह बेटे की
आधी रोटी का कर्ज...


मेरी माँ ने झूठ बोल के आंसू छिपा लिया
भूखी रह भरे पेट का बहाना बना लिया...
सिर पे उठा के बोझा जब थक गई थी वो
इक घूंट पानी पीके अपना ग़म दबा लिया...
दिन सारा की थी मेहनत पर कुछ नहीं मिला
इस दर्द को ही अपना मुकद्दर बना लिया...
फटे हुए कपड़ों को सीं सींकर है पहनती
ग़मों को फिर आँखों में अपनी छिपा लिया...
कब से अकेली जी रही ख़ुद ही के वो सहारे
उसने था तन्हाई को अपना बना लिया...
पता था उसे आज भी आया नहीं बापू
तो डाकिया से फिर पुराना ख़त पढ़ा लिया...
अगर इस माँ का अब इक आंसू निकल गया
तो मान लेना तुमने अपना सब गवां दिया...
 



पोस्ट - द वेबजोन साइबर 




परिवार





परिवार

पत्नी बार बार मां पर इल्जाम लगाए जा
रही थी और पति बार बार उसको अपनी हद में
रहने की कह रहा था
लेकिन पत्नी चुप होने का नाम ही नही ले
रही थी व् जोर जोर से चीख चीखकर कह रही
थी कि
"उसने अंगूठी टेबल पर ही रखी थी और तुम्हारे
और मेरे अलावा इस कमरें मे कोई नही आया
अंगूठी हो ना हो मां जी ने ही उठाई है।।
बात जब पति की बर्दाश्त के बाहर हो गई तो
उसने पत्नी के गाल पर एक जोरदार तमाचा दे
मारा
अभी तीन महीने पहले ही तो शादी हुई थी ।
पत्नी से तमाचा सहन नही हुआ
वह घर छोड़कर जाने लगी और जाते जाते पति
से एक सवाल पूछा कि तुमको अपनी मां पर
इतना विश्वास क्यूं है..??
तब पति ने जो जवाब दिया उस जवाब को
सुनकर दरवाजे के पीछे खड़ी मां ने सुना तो
उसका मन भर आया पति ने पत्नी को बताया
कि
"जब वह छोटा था तब उसके पिताजी गुजर गए
मां मोहल्ले के घरों मे झाडू पोछा लगाकर जो
कमा पाती थी उससे एक वक्त का खाना
आता था
मां एक थाली में मुझे परोसा देती थी और
खाली डिब्बे को ढककर रख देती थी और
कहती थी मेरी रोटियां इस डिब्बे में है
बेटा तू खा ले
मैं भी हमेशा आधी रोटी खाकर कह देता था
कि मां मेरा पेट भर गया है मुझे और नही
खाना है
मां ने मुझे मेरी झूठी आधी रोटी खाकर मुझे
पाला पोसा और बड़ा किया है
आज मैं दो रोटी कमाने लायक हो गया हूं
लेकिन यह कैसे भूल सकता हूं कि मां ने उम्र के
उस पड़ाव पर अपनी इच्छाओं को मारा है,
वह मां आज उम्र के इस पड़ाव पर किसी अंगूठी
की भूखी होगी ....
यह मैं सोच भी नही सकता
तुम तो तीन महीने से मेरे साथ हो
मैंने तो मां की तपस्या को पिछले पच्चीस
वर्षों से देखा है...
यह सुनकर मां की आंखों से छलक उठे वह समझ
नही पा रही थी कि बेटा उसकी आधी
रोटी का कर्ज चुका रहा है या वह बेटे की
आधी रोटी का कर्ज...

मेरी माँ ने झूठ बोल के आंसू छिपा लिया
भूखी रह भरे पेट का बहाना बना लिया...
सिर पे उठा के बोझा जब थक गई थी वो
इक घूंट पानी पीके अपना ग़म दबा लिया...
दिन सारा की थी मेहनत पर कुछ नहीं मिला
इस दर्द को ही अपना मुकद्दर बना लिया...
फटे हुए कपड़ों को सीं सींकर है पहनती
ग़मों को फिर आँखों में अपनी छिपा लिया...
कब से अकेली जी रही ख़ुद ही के वो सहारे
उसने था तन्हाई को अपना बना लिया...
पता था उसे आज भी आया नहीं बापू
तो डाकिया से फिर पुराना ख़त पढ़ा लिया...
अगर इस माँ का अब इक आंसू निकल गया
तो मान लेना तुमने अपना सब गवां दिया...

जिंदगी में आशाये जगायेंगे अपने , सोये हुये सपनो को बनायेंगे अपने !
छा जाएंगे सितारा बनके एक दिन , एक अलग दुनिया बनायेंगे अपने !!

प्रेम और सहयोग का नाम है परिवार



प्रेम और सहयोग का नाम है परिवार




पारिवारिक सदस्यों के त्याग, सहयोग, स्वच्छता, प्रेम, संतुष्टि व व्यसनमुक्ति से ही परिवार संयुक्त और समृद्घिशाली बनता है। वे सौभाग्यशाली हैं जो संयुक्त परिवार में रह रहे हैं तथा जिन्हें माता -पिता का सान्निध्य प्राप्त हो रहा है। विश्व बंधुत्व की बात करने वालों को पहले अपने परिवार में बंधुत्व बनाए रखने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। आज छोटी-छोटी बातों को लेकर परिवार टूट रहे हैं। हम अधिकारों की बजाए एक-दूसरे के हितों का ध्यान रखेंगे, तभी हमारे परिवार खुशहाल और सुदृ़ढ़ होंगे।

एक माता-पिता अपने पाँच-पाँच बच्चों को पाल पोसकर बड़ा करके योग्य बना देते हैं जबकि पाँच-पाँच बच्चे बु़ढ़ापे में अपने एक माता-पिता को संभालने से कतराते हैं। आज हम जितने बूढ़े दादा-दादी के प्रति लापरवाह हैं यदि हमारे बचपन में वे हमारे प्रति इतने ही लापरवाह होते तो हमारी क्या दुर्गति हो गई होती। इस बात को युवा पीढ़ी को अच्छी तरह ध्यान रखना चाहिए।

परिवार में ब्याह कर आई नई बहू को चाहिए कि जितने उम्र का पति उसे मिला है कम से कम उतने साल तो सास-ससुर का फर्ज मानकर उन्हें निभा देना चाहिए। इस पीढ़ी को व्यसनमुक्त होकर अपने माता-पिता की सेवा करने, उनके प्रणाम करने के तरीको को ज‍ीवन में अपनाना चाहिए।

जीवन में सदाचार को अपना कर हमें अपने विचारों को बदलना होगा। विचार जीवन का प्रतिबिंब है। संतों की संगति से अच्छे विचार आते हैं। विचार अच्छे होना हमारी जागरूकता को दर्शाता है। हमारे विचार हमारे जीवन का परिचय देते हैं। रुपया-पैसे का लालच छोड़कर हमें जीवन में धार्मिक आराधना करते रहना चाहिए। जिससे हमारा जीवन और हमारे परिवार का जीवन सार्थक होगा।